“निज भाषा उन्नति अहै , सब उन्नति को मूल” पंक्ति किसकी है (“nij bhaasha unnati ahai , sab unnati ko mool” pankti kisakee hai) :- - www.studyandupdates.com

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“निज भाषा उन्नति अहै , सब उन्नति को मूल” पंक्ति किसकी है (“nij bhaasha unnati ahai , sab unnati ko mool” pankti kisakee hai) :-

11.  “निज भाषा उन्नति अहै , सब उन्नति को मूल” पंक्ति किसकी है

  1.  मैथिलीशरण गुप्त
  2. भारतेंदु हरिश्चंद्र
  3. रामधारी सिंह दिनकर
  4. सुमित्रानंदन पंत

उत्तर  :- भारतेंदु हरिश्चंद्र



यह प्रसिद्ध दोहा भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की प्रसिद्ध कविता निज भाषा से लिया गया है। हिन्दी सम्बन्धित आन्दोलनों और आयोजनों में यह दोहा अनगिनत बार प्रेरणास्रोत की तरह उद्धृत किया जाता रहा है। इस कविता में कुल दस दोहे हैं।


इसमें कवि मातृभाषा का उपयोग सभी प्रकार की शिक्षा के लिए करने पर जोर देते हैं-


"निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।

बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।।

विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार।

सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार।।"



भावार्थ:


निज यानी अपनी भाषा से ही उन्नति संभव है, क्योंकि यही सारी उन्नतियों का मूलाधार है।

मातृभाषा के ज्ञान के बिना हृदय की पीड़ा का निवारण संभव नहीं है।

विभिन्न प्रकार की कलाएँ, असीमित शिक्षा तथा अनेक प्रकार का ज्ञान,

सभी देशों से जरूर लेने चाहिये, परन्तु उनका प्रचार मातृभाषा के द्वारा ही करना चाहिये।



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